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नन्हीं बहनों का पहला रोज़ा: 6 साल की आसिफा और 8 साल की शीफा दोनों बहनो ने दिखाई आस्था और अनुशासन की मिसाल

हरदा खिरकिया। पवित्र माह रमजान की शुरुआत के साथ ही शहर में एक भावुक और प्रेरणादायक दृश्य देखने को मिला। आसिफा महज़ 6 वर्ष और शीफा 8 वर्ष की दो सगी बहनों ने इस साल अपना पहला रोज़ा रखकर न केवल अपने परिवार बल्कि पूरे मोहल्ले का दिल जीत लिया। कम उम्र में दिखाए गए उनके जज़्बे और अनुशासन की हर ओर सराहना हो रही है।
सुबह सहरी से शुरू हुआ उत्साह
रोज़े की तैयारी दोनों बहनों ने रात से ही कर ली थी। परिवार के अनुसार, बच्चियां कई दिनों से रोज़ा रखने की जिद कर रही थीं। सुबह सहरी के समय वे खुद अलार्म से पहले उठ गईं और पूरे उत्साह के साथ सहरी की। माता रुकसार पिता यासीन खान ने बताया कि बच्चियों ने पूरे दिन संयम और धैर्य बनाए रखा।
परिवार ने बढ़ाया हौसला
माता-पिता ने कहा कि उन्होंने बच्चियों पर कोई दबाव नहीं डाला, बल्कि उनकी इच्छा का सम्मान किया। दिनभर बच्चियां सामान्य गतिविधियों में व्यस्त रहीं और रोज़े के महत्व को समझते हुए संयम का परिचय दिया। परिवार ने इफ्तार के समय विशेष तैयारी की और बच्चियों की पसंद के व्यंजन बनाए गए।
मोहल्ले में बनी चर्चा
इतनी कम उम्र में रोज़ा रखने की खबर फैलते ही पड़ोसियों और रिश्तेदारों ने बच्चियों को शुभकामनाएं दीं। कई लोगों ने इसे नई पीढ़ी में धार्मिक संस्कारों और अनुशासन का सकारात्मक संकेत बताया।
आस्था के साथ सीख
  1. विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों को धार्मिक परंपराओं से जोड़ने का उद्देश्य उनमें संयम, सहनशीलता और अनुशासन जैसे गुण विकसित करना होता है। हालांकि, अभिभावकों को बच्चों की सेहत का विशेष ध्यान रखने की भी आवश्यकता होती है। इन नन्हीं बहनों का पहला रोज़ा परिवार के लिए गर्व और खुशी का क्षण बन गया। पवित्र महीने की इस शुरुआत ने उनके जीवन में एक यादगार अध्याय जोड़ दिया है। परिवार ने सभी से दुआओं की अपील की है कि बच्चियां स्वस्थ रहें और आगे भी इसी उत्साह के साथ जीवन में आगे बढ़ती रहें।

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